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देवउठनी एकादशी 2026 और 2027: तारीख़, मुहूर्त और महत्व

देवउठनी एकादशी 2026

20 नवंबर 2026

शुक्रवार

17 दिन बाकी

देवउठनी एकादशी 2027

10 नवंबर 2027

बुधवार

372 दिन बाकी

सीधा जवाब

देवउठनी एकादशी 2026 में शुक्रवार, 20 नवंबर 2026 को है (दिल्ली)। देवउठनी एकादशी कार्तिक शुक्ल एकादशी को आती है, जब चार महीने की योगनिद्रा के बाद भगवान विष्णु जागते हैं, तुलसी विवाह होता है और शादी-ब्याह जैसे शुभ काम फिर शुरू होते हैं।

मुख्य बातें

  • 2026: 20 नवंबर 2026, शुक्रवार
  • 2027: 10 नवंबर 2027, बुधवार
  • हर साल के हिस्से में लिखा है कि वह तारीख़ किस नियम से निकली और मुहूर्त तिथि के भीतर कैसे काटा गया।
  • सभी समय दिल्ली के हैं; विदेश में तिथि स्थानीय समय से बदलती है, इसलिए तारीख़ एक दिन अलग हो सकती है।

देवउठनी एकादशी क्या है

आषाढ़ शुक्ल एकादशी यानी देवशयनी एकादशी को भगवान विष्णु क्षीर सागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद के चार महीने चातुर्मास कहलाते हैं, जिनमें शादी, गृह प्रवेश और मुंडन जैसे शुभ काम आम तौर पर टाले जाते हैं। कार्तिक शुक्ल एकादशी को भगवान जागते हैं, इसलिए इसे देवउठनी, देवोत्थान या प्रबोधिनी एकादशी कहते हैं।

इस दिन से शादियों का मौसम शुरू हो जाता है और घरों में रुके हुए शुभ काम फिर से तय होने लगते हैं। इसी दिन या अगले दिन तुलसी विवाह होता है, जिसमें तुलसी के पौधे का विवाह शालिग्राम या भगवान विष्णु से कराया जाता है। माना जाता है कि तुलसी विवाह कराने से कन्यादान जैसा पुण्य मिलता है।

देवउठनी एकादशी कैसे मनाते हैं

व्रती एक दिन पहले से सादा भोजन करते हैं और एकादशी को अनाज नहीं खाते। कई लोग केवल फल और दूध लेते हैं, कुछ निर्जला व्रत रखते हैं। बुजुर्ग, गर्भवती या बीमार लोग अक्सर हल्का फलाहार व्रत रखते हैं। शाम को आँगन में गेरू और चावल के आटे से भगवान के चरण और चौक बनाया जाता है, उस पर गन्ना, सिंघाड़ा, शकरकंद, बेर और मौसमी फल रखकर डलिया से ढँका जाता है।

फिर थाली बजाकर और 'उठो देव, बैठो देव' जैसे लोकगीत गाकर भगवान को जगाया जाता है। तुलसी के गमले को दुल्हन की तरह सजाया जाता है, गन्ने का मंडप बनता है और फेरे कराए जाते हैं। महाराष्ट्र में इस दिन लाखों श्रद्धालु विठोबा के दर्शन के लिए पंढरपुर पहुँचते हैं। गुजरात और विदेश के कई मंदिरों में भी तुलसी विवाह धूमधाम से होता है। अगले दिन द्वादशी में पारण करके व्रत खोला जाता है।

देवउठनी एकादशी 2026: तारीख़ और मुहूर्त (दिल्ली)

शुक्रवार, 20 नवंबर 2026

शुक्ल पक्ष की एकादशी किसी भी सूर्योदय को नहीं छूती (क्षय तिथि), इसलिए जिस दिन शुरू होती है, उसी दिन रखी गई है। इस दिन सूर्योदय पर पिछली तिथि थी।

तिथि
20 नवंबर, सुबह 7:16 – 21 नवंबर, सुबह 6:31
पारण (व्रत खोलने का समय)
21 नवंबर, दोपहर 1:11 – 21 नवंबर, शाम 5:25

हरि वासर प्रातःकाल के बाद ख़त्म होता है, इसलिए मध्याह्न के बाद, द्वादशी रहते (सूर्यास्त तक)।

हरि वासर समाप्त (द्वादशी का पहला चौथाई भाग)
21 नवंबर, दोपहर 12:08
सूर्योदय / सूर्यास्त
सुबह 6:48 / शाम 5:26
राहु काल (इस दिन)
सुबह 10:47 – दोपहर 12:07

देवउठनी एकादशी उस दिन मनाई जाती है जब सूर्योदय के समय एकादशी तिथि हो, और व्रत भी सूर्योदय से ही शुरू होता है। भगवान को जगाने की पूजा और तुलसी विवाह आम तौर पर शाम को प्रदोष के समय होते हैं। व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद, द्वादशी तिथि खत्म होने से पहले करना जरूरी माना जाता है। द्वादशी के पहले चौथाई हिस्से, जिसे हरि वासर कहते हैं, में पारण से बचा जाता है।

देवउठनी एकादशी 2027: तारीख़ और मुहूर्त (दिल्ली)

बुधवार, 10 नवंबर 2027

शुक्ल पक्ष की एकादशी इस दिन सूर्योदय के समय मौजूद है (उदया तिथि)।

तिथि
9 नवंबर, सुबह 7:34 – 10 नवंबर, सुबह 9:11
पारण (व्रत खोलने का समय)
11 नवंबर, सुबह 6:40 – 11 नवंबर, सुबह 8:50

प्रातःकाल में, हरि वासर के बाद और द्वादशी रहते।

हरि वासर समाप्त (द्वादशी का पहला चौथाई भाग)
दोपहर 3:26
सूर्योदय / सूर्यास्त
सुबह 6:39 / शाम 5:30
राहु काल (इस दिन)
दोपहर 12:05 – दोपहर 1:26

देवउठनी एकादशी की शुभकामनाएँ

जागें श्रीहरि, जागे आपका भाग्य, तुलसी माँ की कृपा से घर में बसे सुख और सौभाग्य। देवउठनी एकादशी की शुभकामनाएँ!
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

देवउठनी एकादशी का पारण कब करें?

देवउठनी एकादशी का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद, द्वादशी तिथि खत्म होने से पहले करना चाहिए। द्वादशी का पहला चौथाई हिस्सा हरि वासर कहलाता है, जिसमें पारण नहीं किया जाता। सुबह का समय पारण के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। पारण का सही समय हर शहर में अलग होता है, इसलिए अपने शहर का पंचांग जरूर देखें।

तुलसी विवाह कैसे किया जाता है?

तुलसी के गमले को साफ करके लाल चुनरी, चूड़ी, बिंदी और गहनों से दुल्हन की तरह सजाया जाता है। पास में शालिग्राम या विष्णु की मूर्ति रखी जाती है। गन्ने से मंडप बनता है, हल्दी, रोली और फूल चढ़ते हैं, फिर मंत्र या विवाह गीतों के साथ फेरे कराए जाते हैं। अंत में आरती होती है और सबमें प्रसाद बाँटा जाता है।

देवउठनी एकादशी के बाद शादियाँ क्यों शुरू होती हैं?

मान्यता है कि चातुर्मास में भगवान विष्णु सोए रहते हैं, इसलिए इस समय शादी जैसे बड़े संस्कार टाले जाते हैं। देवउठनी एकादशी पर भगवान के जागने के साथ यह रोक हट जाती है। हालाँकि शादी का सही मुहूर्त ग्रह-नक्षत्र देखकर ही निकाला जाता है, इसलिए कई परिवार इसके बाद भी पंडित से मुहूर्त जरूर पूछते हैं।

देवउठनी एकादशी के व्रत में क्या खा सकते हैं?

इस व्रत में अनाज, चावल, दाल और साधारण नमक वाला खाना नहीं खाया जाता। फल, दूध, दही, मेवे, साबूदाना, सिंघाड़े या कुट्टू का आटा, शकरकंद और सेंधा नमक से बना फलाहार लिया जा सकता है। कुछ लोग निर्जला व्रत रखते हैं। बुजुर्ग, गर्भवती या बीमार लोग अक्सर हल्का फलाहार व्रत ही रखते हैं।

देवउठनी एकादशी पर भगवान को कैसे जगाते हैं?

शाम को आँगन या पूजा घर में गेरू और आटे से भगवान के चरण बनाए जाते हैं। उन पर गन्ना, सिंघाड़ा, बेर और नए फल रखकर डलिया या सूप से ढँकते हैं। फिर घर की महिलाएँ थाली या सूप बजाते हुए 'उठो देव, जागो देव' जैसे लोकगीत गाती हैं और दीये जलाकर भगवान का स्वागत करती हैं।

चातुर्मास क्या है और कब खत्म होता है?

चातुर्मास वे चार महीने हैं जो देवशयनी एकादशी से शुरू होकर देवउठनी एकादशी पर खत्म होते हैं। इस दौरान साधु-संत एक जगह रुककर साधना करते हैं और कई गृहस्थ भी खान-पान में संयम रखते हैं। जैन परंपरा में भी चातुर्मास का बड़ा महत्व है। देवउठनी एकादशी पर भगवान के जागने के साथ यह समय पूरा होता है।

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