जन्माष्टमी 2026 और 2027: तारीख़, मुहूर्त और महत्व
सीधा जवाब
जन्माष्टमी 2027 में बुधवार, 25 अगस्त 2027 को है (दिल्ली)। दूसरी परंपरा में 24 अगस्त 2027। जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव है, जिसमें भक्त दिन भर व्रत रखते हैं और आधी रात को कान्हा के जन्म की पूजा करके उत्सव मनाते हैं।
मुख्य बातें
- 2026: 4 सितंबर 2026, शुक्रवार
- 2027: 25 अगस्त 2027, बुधवार
- हर साल के हिस्से में लिखा है कि वह तारीख़ किस नियम से निकली और मुहूर्त तिथि के भीतर कैसे काटा गया।
- सभी समय दिल्ली के हैं; विदेश में तिथि स्थानीय समय से बदलती है, इसलिए तारीख़ एक दिन अलग हो सकती है।
जन्माष्टमी क्या है
भागवत पुराण के अनुसार भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आधी रात के समय मथुरा के कारागार में देवकी और वसुदेव के घर श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। उस रात रोहिणी नक्षत्र था। अत्याचारी कंस से बचाने के लिए वसुदेव उफनती यमुना पार करके नवजात शिशु को गोकुल में नंद बाबा और यशोदा मैया के पास छोड़ आए।
उत्तर भारत में इस महीने को भादों कहते हैं, जबकि अमांत पंचांग मानने वाले महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत में यही तिथि श्रावण कृष्ण अष्टमी कहलाती है। नाम अलग है, रात वही। कृष्ण का बचपन, माखन चोरी, गोवर्धन उठाना और गीता का उपदेश, सब मिलकर इस त्योहार को प्रेम, शरारत और धर्म का संगम बना देते हैं।
जन्माष्टमी कैसे मनाते हैं
भक्त सुबह से व्रत रखते हैं; कुछ निर्जल, तो ज़्यादातर फलाहार करते हैं। घरों और मंदिरों में कृष्ण लीला की झाँकियाँ सजती हैं और लड्डू गोपाल का पालना फूलों से सजाया जाता है। आधी रात को शंख और घंटियों के बीच कान्हा का दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से अभिषेक होता है, नए वस्त्र पहनाए जाते हैं और माखन-मिश्री और धनिये की पंजीरी का भोग लगता है।
मथुरा-वृंदावन में यह उत्सव कई दिनों तक चलता है। महाराष्ट्र में अगले दिन गोपालकाला या दही हांडी होती है, जिसमें गोविंदा टोलियाँ एक के ऊपर एक चढ़कर ऊँची मटकी फोड़ती हैं। गुजरात के द्वारकाधीश मंदिर में भारी भीड़ उमड़ती है। दक्षिण भारत में गोकुलाष्टमी या श्रीजयंती पर दरवाज़े से पूजा घर तक चावल के आटे से नन्हे पैरों के निशान बनाए जाते हैं, मानो कान्हा खुद घर आए हों। विदेश में इस्कॉन मंदिरों में रात भर कीर्तन होता है।
जन्माष्टमी 2026: तारीख़ और मुहूर्त (दिल्ली)
शुक्रवार, 4 सितंबर 2026
कृष्ण पक्ष की अष्टमी इस दिन सूर्योदय के समय मौजूद है (उदया तिथि)।
मुख्य तारीख़: जिस दिन सूर्योदय पर अष्टमी हो। 2026 और 2027 में यह drikpanchang की नई दिल्ली की तारीख़ और केंद्र सरकार की (वैष्णव) छुट्टी से मेल खाती है।
- तिथि
- 4 सितंबर, रात 2:25 – 5 सितंबर, रात 12:13
- निशीथ पूजा
- रात 11:58 – 5 सितंबर, रात 12:43
- रोहिणी नक्षत्र
- रात 12:29 – रात 11:04
- पारण: अष्टमी और रोहिणी दोनों ख़त्म होने के बाद (धर्मशास्त्र)
- 5 सितंबर, सुबह 6:01
- पारण: अगले दिन सूर्योदय के बाद (वैकल्पिक)
- 5 सितंबर, सुबह 6:01
- पारण: निशीथ के बाद (आधुनिक प्रचलन)
- 5 सितंबर, रात 12:43
- सूर्योदय / सूर्यास्त
- सुबह 6:01 / शाम 6:39
- राहु काल (इस दिन)
- सुबह 10:45 – दोपहर 12:20
इस रात निशीथ काल में अष्टमी है और रोहिणी नक्षत्र नहीं है।
अष्टमी और रोहिणी सूर्योदय से पहले ख़त्म हो जाती हैं, इसलिए सूर्योदय के बाद।
जन्माष्टमी में सबसे अहम समय निशीथ काल है, यानी आधी रात के आसपास का वह हिस्सा जब श्रीकृष्ण का जन्म माना जाता है। इसलिए व्रत उस रात रखा जाता है जब अष्टमी तिथि निशीथ काल में हो। कई लोग रोहिणी नक्षत्र का संयोग भी देखते हैं। स्मार्त परंपरा और इस्कॉन जैसी वैष्णव परंपरा के नियम थोड़े अलग हैं, इसलिए कभी-कभी दोनों की जन्माष्टमी एक दिन आगे-पीछे पड़ती है। कुछ लोग आधी रात की पूजा के बाद व्रत खोलते हैं, तो कुछ अगले दिन।
जन्माष्टमी 2027: तारीख़ और मुहूर्त (दिल्ली)
बुधवार, 25 अगस्त 2027
कृष्ण पक्ष की अष्टमी इस दिन सूर्योदय के समय मौजूद है (उदया तिथि)।
मुख्य तारीख़: जिस दिन सूर्योदय पर अष्टमी हो। 2026 और 2027 में यह drikpanchang की नई दिल्ली की तारीख़ और केंद्र सरकार की (वैष्णव) छुट्टी से मेल खाती है।
अष्टमी-निशीथ नियम (निशीथ काल में अष्टमी) से: मंगलवार, 24 अगस्त 2027। drikpanchang के स्मार्त सारांश में यही पहली प्राथमिकता बताई गई है, फिर भी वह इस साल ऊपर वाली तारीख़ देता है; यह अंतर अभी अनसुलझा है।
केंद्र सरकार की छुट्टी (दिल्ली/नई दिल्ली, DoPT): जन्माष्टमी (वैष्णव), बुधवार 25 अगस्त 2027।
- तिथि
- 24 अगस्त, रात 8:25 – 25 अगस्त, शाम 7:20
- निशीथ पूजा
- 26 अगस्त, रात 12:01 – 26 अगस्त, रात 12:46
- रोहिणी नक्षत्र
- दोपहर 12:28 – 26 अगस्त, सुबह 11:43
- पारण: अष्टमी और रोहिणी दोनों ख़त्म होने के बाद (धर्मशास्त्र)
- 26 अगस्त, सुबह 11:43
- पारण: अगले दिन सूर्योदय के बाद (वैकल्पिक)
- 26 अगस्त, सुबह 5:56
- पारण: निशीथ के बाद (आधुनिक प्रचलन)
- 26 अगस्त, रात 12:46
- सूर्योदय / सूर्यास्त
- सुबह 5:55 / शाम 6:51
- राहु काल (इस दिन)
- दोपहर 12:23 – दोपहर 2:00
इस रात निशीथ काल में अष्टमी नहीं है और रोहिणी नक्षत्र है।
जन्माष्टमी की शुभकामनाएँ
आधी रात को जब शंख बजे और कान्हा पालने में मुस्कुराएँ, तो आपके घर में भी सुख और प्रेम उतर आए। जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।यह संदेश WhatsApp पर भेजें
और शुभकामना संदेश जल्द इसी जगह जोड़े जाएँगे।
संबंधित त्योहार और सूचियाँ
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
जन्माष्टमी दो दिन क्यों मनाई जाती है?
अक्सर पंचांग में जन्माष्टमी दो दिन लिखी दिखती है। पहला दिन आम तौर पर स्मार्त परंपरा का होता है, जो देखती है कि किस रात आधी रात के समय अष्टमी तिथि है। दूसरा दिन वैष्णव परंपरा का होता है, जिसमें इस्कॉन जैसी संस्थाएँ सूर्योदय के समय की अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र को ज़्यादा महत्व देती हैं। अपने परिवार या मंदिर की परंपरा के अनुसार दिन चुनें।
जन्माष्टमी का व्रत कब और कैसे खोलें?
ज़्यादातर घरों में आधी रात को कान्हा के जन्म की पूजा, अभिषेक और आरती के बाद प्रसाद लेकर व्रत खोला जाता है। कुछ परंपराओं में व्रत अगले दिन सूर्योदय के बाद खोला जाता है, जब अष्टमी तिथि या रोहिणी नक्षत्र खत्म हो चुका हो। व्रत खोलते समय पहले पंचामृत या माखन-मिश्री का प्रसाद लिया जाता है, फिर सादा भोजन किया जाता है।
जन्माष्टमी पर रोहिणी नक्षत्र का क्या महत्व है?
भागवत और दूसरे पुराणों में बताया गया है कि श्रीकृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। इसलिए जिस रात अष्टमी तिथि के साथ रोहिणी नक्षत्र भी हो, उसे बहुत शुभ माना जाता है और इसे जयंती योग कहा जाता है। हर साल यह संयोग नहीं बनता। कई परिवार तिथि को ही मुख्य मानते हैं, जबकि कुछ परंपराएँ नक्षत्र को भी बराबर महत्व देती हैं।
लड्डू गोपाल की पूजा घर पर कैसे करें?
शाम को पूजा स्थान साफ़ करके लड्डू गोपाल का छोटा पालना सजाएँ। आधी रात से पहले भजन-कीर्तन करें। जन्म के समय शंख बजाकर पंचामृत से स्नान कराएँ, फिर साफ़ पानी से धोकर नए वस्त्र, मुकुट और बाँसुरी पहनाएँ। तुलसी पत्ता डालकर माखन-मिश्री, फल और पंजीरी का भोग लगाएँ, आरती करके पालना झुलाएँ और सबको प्रसाद बाँटें।
दही हांडी क्या है और कहाँ मनाई जाती है?
दही हांडी जन्माष्टमी के अगले दिन का उत्सव है, जो सबसे ज़्यादा महाराष्ट्र में, खासकर मुंबई और ठाणे में धूमधाम से होता है। दही और माखन से भरी मटकी ऊँचाई पर टाँगी जाती है और गोविंदा टोलियाँ एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर उसे फोड़ती हैं। यह कृष्ण की बचपन की माखन चोरी की याद दिलाता है। गोवा और गुजरात के कुछ हिस्सों में भी ऐसा होता है।
क्या गर्भवती महिलाएँ जन्माष्टमी का व्रत रख सकती हैं?
बहुत-सी गर्भवती महिलाएँ श्रद्धा से यह व्रत रखती हैं, पर ज़्यादातर परिवारों में उन्हें निर्जल व्रत की जगह हल्का व्रत रखने को कहा जाता है, जिसमें फल, दूध और पानी लिया जा सके। यही बात बुज़ुर्गों और बीमार लोगों पर भी लागू होती है। अपनी सेहत को लेकर संदेह हो तो डॉक्टर से बात करना ठीक है। भाव से की गई पूजा ही असली व्रत है।