दिवाली 2026 और 2027: तारीख़, मुहूर्त और महत्व
सीधा जवाब
दिवाली 2026 में रविवार, 8 नवंबर 2026 को है (दिल्ली)। दिवाली कार्तिक अमावस्या की रात का प्रकाश पर्व है, जब शाम को प्रदोष काल में लक्ष्मी-गणेश की पूजा होती है और घर-आँगन दीयों और रंगोली से जगमगा उठते हैं।
मुख्य बातें
- 2026: 8 नवंबर 2026, रविवार
- 2027: 29 अक्टूबर 2027, शुक्रवार
- हर साल के हिस्से में लिखा है कि वह तारीख़ किस नियम से निकली और मुहूर्त तिथि के भीतर कैसे काटा गया।
- सभी समय दिल्ली के हैं; विदेश में तिथि स्थानीय समय से बदलती है, इसलिए तारीख़ एक दिन अलग हो सकती है।
दिवाली क्या है
दिवाली यानी दीपों की पंक्ति। उत्तर भारत के पंचांग में यह कार्तिक अमावस्या को मनाई जाती है, जबकि अमावस्या पर महीना पूरा करने वाले पंचांग में यही रात आश्विन अमावस्या कहलाती है। साल की सबसे अंधेरी रातों में से एक को दीयों से रोशन करना याद दिलाता है कि अंधकार कितना भी गहरा हो, एक छोटा दीया उसे हरा सकता है।
उत्तर भारत में दिवाली को भगवान राम के चौदह साल के वनवास के बाद अयोध्या लौटने से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि समुद्र मंथन से इसी दिन लक्ष्मी प्रकट हुई थीं, इसलिए इस रात घर-घर उनका स्वागत होता है। बंगाल में इसी रात काली पूजा होती है, जैन समाज इसे भगवान महावीर के निर्वाण दिवस के रूप में मनाता है और सिख समाज बंदी छोड़ दिवस मनाता है।
दिवाली कैसे मनाते हैं
हफ्तों पहले से घरों की सफाई और रंग-रोगन शुरू हो जाता है, क्योंकि माना जाता है कि लक्ष्मी साफ और रोशन घर में आती हैं। दिवाली के दिन दरवाजे पर रंगोली, आम के पत्तों का तोरण और गेंदे की माला सजती है। रिश्तेदारों और पड़ोसियों में मिठाई और उपहार बाँटे जाते हैं और बच्चों के लिए नए कपड़े आते हैं।
शाम को चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति रखी जाती है, साथ में जल भरा कलश, सिक्के, खील-बताशे और मिठाई। पहले गणेश, फिर लक्ष्मी और कुबेर की पूजा होती है, आरती गाई जाती है और फिर पूरे घर में दीये रखे जाते हैं। व्यापारी नए बही-खाते की पूजा करते हैं, जिसे गुजरात में चोपड़ा पूजन कहते हैं। विदेश में बसे भारतीय मंदिरों की सामूहिक पूजा और दिवाली मेलों में शामिल होकर यह त्योहार मनाते हैं।
दिवाली 2026: तारीख़ और मुहूर्त (दिल्ली)
रविवार, 8 नवंबर 2026
इस दिन प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्त) का अधिक हिस्सा कृष्ण पक्ष की अमावस्या में पड़ता है।
- तिथि
- 8 नवंबर, सुबह 11:28 – 9 नवंबर, दोपहर 12:31
- लक्ष्मी पूजा (प्रदोष, अमावस्या और वृषभ लग्न एक साथ)
- शाम 5:55 – शाम 7:50
- प्रदोष काल (पूरा)
- शाम 5:31 – रात 8:09
- वृषभ लग्न (स्थिर लग्न)
- शाम 5:55 – शाम 7:51
- महानिशीथ काल (अमावस्या के भीतर)
- रात 11:39 – 9 नवंबर, रात 12:31
- सूर्योदय / सूर्यास्त
- सुबह 6:38 / शाम 5:31
- राहु काल (इस दिन)
- शाम 4:10 – शाम 5:31
पूरा काल (तिथि से काटने से पहले): शाम 5:31 – रात 8:09
पूरा काल (तिथि से काटने से पहले): रात 11:39 – 9 नवंबर, रात 12:31
दिवाली की पूजा के लिए शाम का प्रदोष काल सबसे खास है, यानी सूर्यास्त के ठीक बाद का समय। जिस दिन अमावस्या तिथि प्रदोष काल में रहती है, उसी दिन लक्ष्मी पूजा की जाती है। इस समय के भीतर अगर वृषभ जैसा स्थिर लग्न मिल जाए तो पूजा और भी शुभ मानी जाती है, क्योंकि मान्यता है कि स्थिर लग्न में बुलाई गई लक्ष्मी घर में टिकती हैं। तंत्र साधना करने वाले आधी रात का निशीथ काल भी देखते हैं।
दिवाली 2027: तारीख़ और मुहूर्त (दिल्ली)
शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2027
इस दिन प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्त) का अधिक हिस्सा कृष्ण पक्ष की अमावस्या में पड़ता है।
केंद्र सरकार की छुट्टी (दिल्ली/नई दिल्ली, DoPT): दिवाली (दीपावली), शुक्रवार 29 अक्टूबर 2027।
- तिथि
- 28 अक्टूबर, रात 8:48 – 29 अक्टूबर, शाम 7:06
- लक्ष्मी पूजा (प्रदोष, अमावस्या और वृषभ लग्न एक साथ)
- शाम 6:35 – शाम 7:06
- प्रदोष काल (पूरा)
- शाम 5:39 – रात 8:13
- वृषभ लग्न (स्थिर लग्न)
- शाम 6:35 – रात 8:31
- महानिशीथ काल (अमावस्या के भीतर)
- नहीं बनता
- सूर्योदय / सूर्यास्त
- सुबह 6:31 / शाम 5:39
- राहु काल (इस दिन)
- सुबह 10:41 – दोपहर 12:05
पूरा काल (तिथि से काटने से पहले): शाम 5:39 – रात 8:13
इस दिन यह समय तिथि के भीतर नहीं पड़ता, इसलिए कोई मुहूर्त नहीं बनता।
पूरा काल (तिथि से काटने से पहले): रात 11:39 – 30 अक्टूबर, रात 12:31
दिवाली की शुभकामनाएँ
दीयों की लौ जैसी उजली हो आपकी हर राह, लक्ष्मी-गणेश की कृपा से भरा रहे आपका घर-संसार। आपको और आपके परिवार को दिवाली की ढेरों शुभकामनाएँ!यह संदेश WhatsApp पर भेजें
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
दिवाली पर लक्ष्मी पूजा किस समय करनी चाहिए?
दिवाली पर लक्ष्मी पूजा शाम को प्रदोष काल में करना सबसे अच्छा माना जाता है, जब अमावस्या तिथि चल रही हो। इस समय के भीतर वृषभ जैसा स्थिर लग्न मिले तो और भी शुभ है। प्रदोष काल और लग्न का समय हर शहर में अलग होता है, इसलिए अपने शहर के पंचांग में दिया गया मुहूर्त देखकर ही पूजा करें।
दिवाली पर स्थिर लग्न क्यों देखा जाता है?
ज्योतिष में वृषभ, सिंह, वृश्चिक और कुंभ को स्थिर लग्न कहा जाता है। मान्यता है कि स्थिर लग्न में शुरू किया गया काम लंबे समय तक टिकता है। इसलिए लोग चाहते हैं कि लक्ष्मी पूजा ऐसे समय हो, ताकि घर में धन और सुख स्थायी रूप से बना रहे। दिवाली की शाम को अक्सर वृषभ लग्न प्रदोष काल के आसपास ही पड़ता है।
लक्ष्मी पूजा की सामग्री में क्या-क्या चाहिए?
आम तौर पर लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति या तस्वीर, लाल कपड़ा, चौकी, जल से भरा कलश, आम के पत्ते, रोली, हल्दी, अक्षत, फूल, कमलगट्टा, खील-बताशे, मिठाई, सिक्के, दीये, घी या तेल और धूप-अगरबत्ती चाहिए। कई घरों में बही-खाते या तिजोरी की भी पूजा होती है। सामग्री परिवार की परंपरा के हिसाब से थोड़ी अलग हो सकती है।
दिवाली के पाँच दिन कौन-कौन से हैं?
दीपोत्सव धनतेरस से शुरू होता है। दूसरे दिन नरक चतुर्दशी या छोटी दिवाली, तीसरे दिन अमावस्या पर बड़ी दिवाली और लक्ष्मी पूजा, चौथे दिन गोवर्धन पूजा या अन्नकूट, और पाँचवें दिन भाई दूज मनाई जाती है। कभी-कभी तिथियों के घटने-बढ़ने से दो त्योहार एक ही दिन पड़ जाते हैं या बीच में एक खाली दिन आ जाता है।
छोटी दिवाली और बड़ी दिवाली में क्या फर्क है?
छोटी दिवाली नरक चतुर्दशी को कहते हैं, जो आम तौर पर बड़ी दिवाली से एक दिन पहले आती है। इस दिन सुबह उबटन लगाकर स्नान करने और शाम को कुछ दीये जलाने की परंपरा है। दक्षिण भारत में इसी दिन कृष्ण की नरकासुर पर जीत का उत्सव होता है। बड़ी दिवाली अमावस्या की वह रात है जब मुख्य लक्ष्मी पूजा होती है।
दिवाली की रात दीये कहाँ-कहाँ जलाने चाहिए?
सबसे पहला दीया पूजा स्थान पर जलता है। उसके बाद मुख्य दरवाजे के दोनों ओर, आँगन, तुलसी के पास, रसोई, पानी रखने की जगह, छत और खिड़कियों पर दीये रखे जाते हैं। कई लोग पास के मंदिर, कुएँ या पीपल के पेड़ के पास भी दीया रखते हैं। कोशिश रहती है कि घर का कोई कोना उस रात अंधेरा न रहे।