महाशिवरात्रि 2026 और 2027: तारीख़, मुहूर्त और महत्व
सीधा जवाब
महाशिवरात्रि 2027 में शनिवार, 6 मार्च 2027 को है (दिल्ली)। महाशिवरात्रि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की वह रात है जब भक्त भगवान शिव के लिए व्रत रखते हैं, शिवलिंग पर जल और बेलपत्र चढ़ाते हैं और रात भर जागकर पूजा करते हैं।
मुख्य बातें
- 2026: 15 फ़रवरी 2026, रविवार
- 2027: 6 मार्च 2027, शनिवार
- हर साल के हिस्से में लिखा है कि वह तारीख़ किस नियम से निकली और मुहूर्त तिथि के भीतर कैसे काटा गया।
- सभी समय दिल्ली के हैं; विदेश में तिथि स्थानीय समय से बदलती है, इसलिए तारीख़ एक दिन अलग हो सकती है।
महाशिवरात्रि क्या है
हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को शिवरात्रि आती है, लेकिन फाल्गुन महीने की शिवरात्रि को सबसे बड़ी, यानी महाशिवरात्रि कहा जाता है। जो लोग अमांत पंचांग मानते हैं, जैसे महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत में, उनके लिए यही दिन माघ कृष्ण चतुर्दशी कहलाता है। महीने का नाम अलग है, पर त्योहार एक ही रात को होता है।
इस रात से कई कथाएं जुड़ी हैं। एक मान्यता के अनुसार इसी रात शिव और पार्वती का विवाह हुआ था। दूसरी कथा कहती है कि इसी रात शिव अग्नि के अनंत स्तंभ, यानी ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे। एक लोककथा में एक शिकारी अनजाने में रात भर बेलपत्र गिराता रहा और उसे शिव की कृपा मिली। इन सब कथाओं का सार यही है कि सच्चे मन से की गई सरल भक्ति भी शिव तक पहुंचती है।
महाशिवरात्रि कैसे मनाते हैं
भक्त सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लेते हैं। कुछ लोग निर्जल व्रत रखते हैं, तो कुछ फल, दूध या साबूदाना लेते हैं; बुज़ुर्ग, गर्भवती महिलाएं या बीमार लोग अक्सर हल्का व्रत रखते हैं। शिव मंदिरों में सुबह से लंबी कतारें लग जाती हैं। शिवलिंग का जल, दूध, दही, शहद और घी से अभिषेक किया जाता है, और बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल और भस्म चढ़ाई जाती है। ॐ नमः शिवाय का जाप लगातार चलता रहता है।
रात को चार प्रहर की पूजा होती है, यानी रात को चार हिस्सों में बांटकर हर हिस्से में अभिषेक और आरती की जाती है। बहुत से लोग पूरी रात जागकर भजन-कीर्तन करते हैं। उज्जैन, काशी, सोमनाथ और नेपाल के पशुपतिनाथ में इस रात भारी भीड़ होती है। कश्मीरी पंडित इसे हेरथ के नाम से मनाते हैं। विदेश के मंदिरों में भी रात भर अभिषेक और भजन होते हैं।
महाशिवरात्रि 2026: तारीख़ और मुहूर्त (दिल्ली)
रविवार, 15 फ़रवरी 2026
इस दिन निशीथ काल (स्थानीय मध्यरात्रि के आसपास) का अधिक हिस्सा कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी में पड़ता है।
- तिथि
- 15 फ़रवरी, शाम 5:05 – 16 फ़रवरी, शाम 5:34
- रात्रि प्रथम प्रहर पूजा
- शाम 6:11 – रात 9:23
- रात्रि द्वितीय प्रहर पूजा
- रात 9:23 – 16 फ़रवरी, रात 12:35
- रात्रि तृतीय प्रहर पूजा
- 16 फ़रवरी, रात 12:35 – 16 फ़रवरी, रात 3:47
- रात्रि चतुर्थ प्रहर पूजा
- 16 फ़रवरी, रात 3:47 – 16 फ़रवरी, सुबह 6:59
- निशीथ काल पूजा (चतुर्दशी के भीतर)
- 16 फ़रवरी, रात 12:09 – 16 फ़रवरी, रात 1:00
- शिवरात्रि पारण
- 16 फ़रवरी, सुबह 6:59 – 16 फ़रवरी, शाम 5:34
- सूर्योदय / सूर्यास्त
- सुबह 7:00 / शाम 6:11
- राहु काल (इस दिन)
- शाम 4:47 – शाम 6:11
पूरा काल (तिथि से काटने से पहले): 16 फ़रवरी, रात 12:09 – 16 फ़रवरी, रात 1:01
अगले दिन सूर्योदय से चतुर्दशी ख़त्म होने तक।
महाशिवरात्रि में रात का सबसे ज़्यादा महत्व है। वही दिन चुना जाता है जिसकी रात के निशीथ काल, यानी आधी रात के आसपास के समय, में चतुर्दशी तिथि मौजूद हो। माना जाता है कि शिव इसी समय लिंग रूप में प्रकट हुए थे, इसलिए निशीथ काल की पूजा सबसे खास होती है। रात के चारों प्रहर की पूजा का भी अपना महत्व है, और व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद किया जाता है। दिल्ली के चारों प्रहर, निशीथ काल और पारण का समय इस पेज के मुहूर्त वाले हिस्से में दिया गया है।
महाशिवरात्रि 2027: तारीख़ और मुहूर्त (दिल्ली)
शनिवार, 6 मार्च 2027
इस दिन निशीथ काल (स्थानीय मध्यरात्रि के आसपास) का अधिक हिस्सा कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी में पड़ता है।
- तिथि
- 6 मार्च, दोपहर 12:03 – 7 मार्च, दोपहर 1:46
- रात्रि प्रथम प्रहर पूजा
- शाम 6:24 – रात 9:28
- रात्रि द्वितीय प्रहर पूजा
- रात 9:28 – 7 मार्च, रात 12:32
- रात्रि तृतीय प्रहर पूजा
- 7 मार्च, रात 12:32 – 7 मार्च, रात 3:36
- रात्रि चतुर्थ प्रहर पूजा
- 7 मार्च, रात 3:36 – 7 मार्च, सुबह 6:40
- निशीथ काल पूजा (चतुर्दशी के भीतर)
- 7 मार्च, रात 12:08 – 7 मार्च, रात 12:56
- शिवरात्रि पारण
- 7 मार्च, सुबह 6:40 – 7 मार्च, दोपहर 1:46
- सूर्योदय / सूर्यास्त
- सुबह 6:41 / शाम 6:24
- राहु काल (इस दिन)
- सुबह 9:37 – सुबह 11:05
पूरा काल (तिथि से काटने से पहले): 7 मार्च, रात 12:08 – 7 मार्च, रात 12:57
अगले दिन सूर्योदय से चतुर्दशी ख़त्म होने तक।
महाशिवरात्रि की शुभकामनाएँ
भोलेनाथ की कृपा से आपका जीवन शांति और शक्ति से भरा रहे। हर हर महादेव! महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं।यह संदेश WhatsApp पर भेजें
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संबंधित त्योहार और सूचियाँ
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
महाशिवरात्रि और हर महीने की शिवरात्रि में क्या अंतर है?
हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मासिक शिवरात्रि आती है, और साल में ऐसी बारह शिवरात्रियां होती हैं। इनमें फाल्गुन महीने वाली शिवरात्रि सबसे बड़ी मानी जाती है, इसलिए उसे महाशिवरात्रि कहते हैं। इसी रात से शिव-पार्वती विवाह और ज्योतिर्लिंग प्रकट होने की कथाएं जुड़ी हैं। जो लोग हर महीने व्रत नहीं रख पाते, वे भी महाशिवरात्रि का व्रत ज़रूर रखते हैं।
महाशिवरात्रि के व्रत में क्या खा सकते हैं?
यह परिवार की परंपरा पर निर्भर करता है। कुछ लोग निर्जल व्रत रखते हैं, जबकि ज़्यादातर लोग फल, दूध, दही, मखाने, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा और सेंधा नमक लेते हैं। अनाज, दालें, प्याज़ और लहसुन आम तौर पर नहीं खाए जाते। बुज़ुर्ग, गर्भवती महिलाएं या जिनकी तबीयत ठीक न हो, वे अक्सर फल और दूध वाला हल्का व्रत रखते हैं।
शिवलिंग पर बेलपत्र कैसे चढ़ाएं?
बेलपत्र तीन पत्तियों वाला होना चाहिए और कटा-फटा न हो। उसे पानी से धोकर, चिकनी तरफ़ शिवलिंग की ओर रखते हुए चढ़ाया जाता है। चढ़ाते समय ॐ नमः शिवाय बोलना काफ़ी है। कई लोग बेलपत्र पर चंदन से ॐ भी लिखते हैं। मान्यता है कि बेलपत्र शिव को बहुत प्रिय है, इसलिए भक्ति से चढ़ाया गया एक पत्ता भी पूरी पूजा के बराबर माना जाता है।
महाशिवरात्रि की रात चार प्रहर की पूजा क्या होती है?
सूर्यास्त से अगले सूर्योदय तक की रात को चार बराबर हिस्सों में बांटा जाता है, जिन्हें प्रहर कहते हैं। हर प्रहर में शिवलिंग का अभिषेक, बेलपत्र अर्पण और आरती की जाती है। परंपरा में पहले प्रहर में दूध, दूसरे में दही, तीसरे में घी और चौथे में शहद से अभिषेक का उल्लेख मिलता है, हालांकि अलग-अलग जगह यह क्रम बदल भी जाता है। दिल्ली के लिए हर प्रहर का समय, तारीख़ के साथ, मुहूर्त वाले हिस्से में दिया गया है।
महाशिवरात्रि का व्रत कब और कैसे खोलें?
ज़्यादातर परंपराओं में व्रत अगले दिन सुबह स्नान और शिव पूजा के बाद खोला जाता है, जिसे पारण कहते हैं। माना जाता है कि पारण सूर्योदय के बाद और चतुर्दशी तिथि खत्म होने से पहले करना अच्छा है। व्रत खोलने के लिए पहले प्रसाद या फल लिया जाता है, फिर सादा भोजन। कुछ परिवार अपनी परंपरा के अनुसार रात की आखिरी पूजा के बाद ही व्रत खोल लेते हैं।
क्या महाशिवरात्रि की रात जागना ज़रूरी है?
रात भर जागकर शिव का ध्यान करना इस त्योहार की सबसे पुरानी परंपरा है, जिसे जागरण कहते हैं। मंदिरों और घरों में भजन, कीर्तन और शिव कथाएं चलती रहती हैं। फिर भी जो लोग पूरी रात नहीं जाग सकते, वे निशीथ काल की पूजा तक जागकर या कम से कम एक प्रहर की पूजा करके भी अपनी भक्ति निभाते हैं। सच्ची श्रद्धा ही सबसे ज़रूरी मानी गई है।